सिन्धु नदीपन्द्रहवीं
शताब्दी में मध्य और पश्चिम एशिया में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। चौदहवीं
शताब्दी में मंगोल साम्राज्य के विघटन के पश्चात तैमूरने ईरान और तूरान को
फिर से एक शासन के अंतर्गत संगठित किया। तैमूर का साम्राज्य वोलगा नदी के
निचले हिस्से से सिन्धु नदी तक फैला हुआ था और उसमें एशिया का माइनर
(आधुनिक तुर्की), ईरान, ट्रांस-आक्सियाना, अफ़ग़ानिस्तान और पंजाब का एक
भाग था। 1404 में तैमूर की मृत्यु हो गई। लेकिन उसके पोते शाहरूख मिर्ज़ा
ने साम्राज्य का अधिकांश भाग संगठित रखा। उसके समय
में समरकन्द और हिरातपश्चिम एशिया के सांस्कृतिक केन्द्र बन गए। प्रत्येक
समरकन्द के शासक का इस्लामी दुनिया में काफ़ी सम्मान था। पंद्रहवीं शताब्दी
के उत्तरार्द्ध में देशों का सम्मान तेज़ी से कम हुआ। इसका कारण तैमूर के
साम्राज्य को विभाजित करने की परम्परा थी। अनेक तैमूर रियासतें, जो इस
प्रक्रिया में बनी, आपस में लड़ती-झगड़ती रहीं। इससे नये तत्वों को आगे
बढ़ने का मौक़ा मिला। उत्तर से एक मंगोल जाति उज़बेक ने ट्रांस-आक्सीयाना
में अपने क़दम बढ़ाये। उज़बेकों ने इस्लाम अपना लिया था। लेकिन तैमूरी
उन्हें असंस्कृत बर्बर ही समझते थे। और पश्चिम की ओर ईरान में सफ़वीं वंश
का उदय हुआ। सफ़वी सन्तों की परम्परा में पनपे थे। जो स्वयं को पैग़म्बर के
वंशज मानते थे। वे मुसलमानों के शिया मत का समर्थन करते थे और उन्हें
परेशान करते थे जो शिया सिद्धांतों को अस्वीकार करते थे। दूसरी ओर
उज़बेक सुन्नी थे। इसलिए उन दोनों तत्वों के बीच संघर्ष साम्प्रदायिक मतभेद
के कारण और भी बढ़ गया। ईरान के भी पश्चिम में आटोमन तुर्कों की शक्ति उभर
रही थी। जो पूर्वी यूरोप तथा ईराक और ईरान पर अधिपत्य ज़माना चाहते थे। इस
प्रकार सोलहवीं शताब्दी में एशिया में तीन बड़ी साम्राज्य शक्तियों के बीच
संघर्ष की भूमिका तैयार हो गईबाबर1494
में ट्रांस-आक्सीयाना की एक छोटी सी रियासत फ़रग़ना का बाबर उत्तराधिकारी
बना। उज़बेक ख़तरे से बेख़बर होकर तैमूर राजकुमार आपस में लड़ रहे
थे। बाबर ने भी अपने चाचा से समरकन्द छीनना चाहा। उसने दो बार उस शहर को
फ़तह किया, लेकिन दोनों ही बार उसे जल्दी ही छोड़ना पड़ा। दूसरी बार उज़बेक
शासक शैबानी ख़ान को समरकन्द से बाबर को खदेड़ने के लिए आमंत्रित किया गया
था। उसने बाबर को हराकर समरकन्दर पर अपना झंडा फहरा दिया। उसके बाद जल्दी
ही उसने उस क्षेत्र में तैमूर साम्राज्य के भागों को भी जीत लिया। इससे
बाबर को क़ाबुल की ओर बढ़ना पड़ा और उसने 1504 में उस पर अधिकार कर लिया।
उसके बाद चौदह वर्ष तक वह इस अवसर की तलाश में रहा कि फिर उज़बेकों को
हराकर अपनी मातृभूमि पर पुनः अधिकार कर सके। उसने अपने चाचा, हिरात के शासक
को अपनी ओर मिलाना चाहा, लेकिन इस कार्य में वह सफल नहीं हुआ। शैबानी ख़ान
ने अंततः हिरात पर भी अधिकार कर लिया। इससे सफ़वीयों से उसका सीधा संघर्ष
उत्पन्न हो गया। क्योंकि वे भी हिरात और उसके आस-पास के क्षेत्र को अपना
कहते थे। इस प्रदेश को तत्कालीन लेखकों ने ख़ुरासान कहा है। 1510 की
प्रसिद्ध लड़ाई में ईरान के शाह इस्माइल ने शैबानी को हराकर मार डाला। इसी
समय बाबर ने समरकन्द जीतने का एक प्रयत्न और किया। इस बार उसने ईरानी सेना
की सहायता ली। वह समरकन्द पहुंच गया। लेकिन जल्दी ही ईरानी सेनापतियों के
व्यवहार के कारण रोष से भर गया। वे उसे ईरानी साम्राज्य का एक गवर्नर ही
मानते थे। स्वतंत्र शासक नहीं। इसी बीच उज़बेक भी अपनी हार से उभर गये।
बाबर को एक बार फिर समरकन्द से खदेड़ दिया गया और उसे क़ाबुल लौटना पड़ा।
स्वयं शाह ईरान इस्माइल को भी आटोहान-साम्राज्य के साथ हुई प्रसिद्ध लड़ाई
में हार का सामना करना पड़ा। इस प्रकार उज़बेक ट्रांस-आक्सीयाना के
निर्विरोध स्वामी हो गए। इन घटनाऔं के कारण ही अन्ततः बाबर ने भारत की ओर
रूख किया।
बाबर ने लिखा है कि क़ाबुल जीतने (1504) से लेकर पानीपत की
लड़ाई तक उसने हिन्दुस्तान जीतने का विचार कभी नहीं त्यागा। लेकिन उसे भारत
विजय के लिए कभी सही अवसर नहीं मिला था। "कभी अपने बेगों के भय के कारण,
कभी मेरे और भाइयों के बीच मतभेद के कारण।" मध्य एशिया के कई अन्य
आक्रमणकारियों की भांति बाबर भी भारत की अपार धन-राशि के कारण इसकी ओर
आकर्षित हुआ था। भारत सोने की क़ान था। बाबर का पूर्वज तैमूर यहाँ से अपार
धन-दौलत और बड़ी संख्या में कुशल शिल्पी ही नहीं ले गया था, जिन्होंने बाद
में उसके एशिया साम्राज्य को सुदृढ़ करने और उसकी राजधानी को सुन्दर बनाने
में योगदान दिया, बल्कि पंजाब के एक भाग को अपने कब्जे में कर लिया था। ये
भाग अनेक पीढ़ियों तक तैमूर के वंशजों के अधीन रहे थे। जब बाबर
ने अफ़ग़ानिस्तान पर विजय प्राप्त की तो उसे लगा कि इन दोनों पर भी उसका
क़ानूनी अधिकार है।
इब्राहीम
लोदीक़ाबुल की सीमित आय भी पंजाब परगना को विजित करने का एक कारण थी।
"उसका (बाबर) राज्य बदखशां, कंधार और क़ाबुल पर था। जिनसे सेना की
अनिवार्यताएं पूरी करने के लिए भी आय नहीं होती थी। वास्तव में कुछ सीमा
प्रान्तों पर सेना बनाए रखने में और प्रशासन के काम में व्यय आमदनी से
ज़्यादा था।"सीमित आय साधनों के कारण बाबर अपने बेगों और परिवार वालों के
लिए अधिक चीज़ें उपलब्ध नहीं कर सकता था। उसे क़ाबुल पर उज़बेक आक्रमण का
भी भय था। वह भारत को बढ़िया शरण-स्थल समझता था। उसकी दृष्टि में उज़बेकों
के विरुद्ध अभियानों के लिए भी यह अच्छा स्थल था। उत्तर-पश्चिम भारत की
राजनीतिक स्थिति ने बाबर को भारत आने का अवसर प्रदान किया। 1517
में सिकन्दर लोदी की मृत्यु हो गई थी और इब्राहीम लोदीगद्दी पर बैठा था। एक
केन्द्राभिमुखी बड़ा साम्राज्य स्थापित करने के इब्राहिम के प्रयत्नों ने
अफ़ग़ानों और राजपूतों दोनों को सावधान कर दिया था। अफ़ग़ान सरदारों में
सर्वाधिक शक्तिशाली सरदार दौलत ख़ाँ लोदी था। जो पंजाब का गवर्नर था। पर
वास्तव में लगभग स्वतंत्र था। दौलत ख़ाँ ने अपने बेटे को इब्राहिम लोदी के
दरबार में उपहार देखकर उसे मनाने का प्रयत्न किया। साथ ही साथ वह भीरा का
सीमान्त प्रदेश जीतकर अपनी स्थिति को भी मज़बूत बनाना चाहता था। 1518-19
में बाबर ने भीरा के शक्तिशाली क़िले को जीत लिया। फिर उसने दौलत ख़ाँ और
इब्राहिम लोदी को पत्र और मौखिक संदेश भेजकर यह मांग की कि जो प्रदेश
तुर्कों के हैं, वे उसे लौटा दिए जाएं। लेकिन दौलत ख़ाँ ने बाबर के दूत
को लाहौर में अटका लिया। वह न स्वयं उससे मिला और न उसे इब्राहिम लोदी के
पास जाने दिया। जब बाबर क़ाबुल लौट गया, तो दौलत ख़ाँ ने भीरा से उसके
प्रतिनिधियों को निकाल बाहर किया।1520-21 में बाबर ने एक बार फिर सिंधु
नदी पार की और आसानी से भीरा और सियालकोट पर क़ब्ज़ा कर लिया। ये भारत के
लिए मुग़ल द्वार थे। लाहौर भी पदाक्रांत हो गया। वह सम्भवतः और आगे बढ़ता,
लेकिन तभी उसे कन्धार में विद्रोह का समाचार मिला। वह उल्टे पांव लौट गया
और डेढ़ साल के घेरे के बाद कन्धार को जीत लिया। उधर से निश्चिंत होकर बाबर
की निगाहें फिर भारत की ओर उठीं। इसी समय के लगभग बाबर के पास दौलत ख़ाँ
लोदी के पुत्र दिलावर ख़ाँ के नेतृत्व में दूत पहुंचे। उन्होंने बाबर को
भारत आने का निमंत्रण दिया और कहा कि चूंकि इब्राहिम लोदी अत्याचारी है और
उसके सरदारों का समर्थन अब उसे प्राप्त नहीं है, इसलिए उसे अपदस्थ करके
बाबर राजा बने। इस बात की सम्भावना है कि राणा सांगा का दूत भी इसी समय
उसके पास पहुंचा। इन दूतों के पहुंचने पर बाबर को लगा कि यदि हिन्दुस्तान
को नहीं, तो सारे पंजाब को जीतने का समय आ गया है। 1525 में जब
बाबर पेशावर में था, उसे ख़बर मिली कि दौलतख़ाँ लोदी ने फिर से अपना पाला
बदल लिया है। उसने 30,000-40,000 सिपाहियों को इकट्ठा कर लिया था और बाबर
की सेनाओं को स्यालकोट से खदेड़ने के बाद लाहौर की ओर बढ़ रहा था। बाबर से
सामना होने पर दौलत ख़ाँ लोदी की सेना बिखर गई। दौलत ख़ाँ ने आत्मसमर्पण कर
दिया और बाबर ने उसे माफ़ी दे दी। इस प्रकार सिंधु नदी पार करने के तीन
सप्ताह के भीतर ही पंजाब पर बाबर का क़ब्ज़ा हो गयापानीपत
युद्ध21 अप्रैल, 1526दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के साथ संघर्ष
अवश्यम्भावी था। बाबर इसके लिए तैयार था और उसने दिल्ली की ओर बढ़ना शृरू
किया। इब्राहिम लोदी ने पानीपत में एक लाख सैनिकों को और एक हज़ार हाथियों
को लेकर बाबर का सामना किया। क्योंकि हिन्दुस्तानी सेनाओं में एक बड़ी
संख्या सेवकों की होती थी, इब्राहिम की सेना में लड़ने वाले सिपाही कहीं कम
रहे होंगे। बाबर ने सिंधु को जब पार किया था तो उसके साथ 12000 सैनिक थे,
परन्तु उसके साथ वे सरदार और सैनिक भी थे जो पंजाब में उसके साथ मिल गये
थे। इस प्रकार उसके सिपाहियों की संख्या बहुत अधिक हो गई थी। फिर भी बाबर
की सेना संख्या की दृष्टि से कम थी। बाबर ने अपनी सेना के एक अंश को शहर
में टिका दिया जहां काफ़ी मकान थे, फिर दूसरे अंश की सुरक्षा उसने खाई खोद
कर उस पर पेड़ों की डालियां डाल दी। सामने उसने गाड़ियों की कतार खड़ी करके
सुरक्षात्मक दीवार बना ली। इस प्रकार उसने अपनी स्थिति काफ़ी मज़बूत कर
ली। दो गाड़ियों के बीच उसने ऎसी संरचना बनवायी, जिस पर सिपाही अपनी तोपें
रखकर गोले चला सकत थे। बाबर इस विधि को आटोमन (रूमी) विधि कहता था। क्योंकि
इसका प्रयोग आटोमनों ने ईरान के शाह इस्माईल के विरुद्ध हुई प्रसिद्ध
लड़ाई में किया था। बाबर ने दो अच्छे निशानेबाज़ तोपचियों उस्ताद अली और
मुस्तफ़ा की सेवाएं भी प्राप्त कर ली थीं। भारत में बारूद का प्रयोग
धीरे-धीरे होना शुरू हुआ। बाबर कहता है कि इसका प्रयोग सबसे पहले उसने भीरा
के क़िले पर आक्रमण के समय किया था। ऎसा अनुमान है कि बारूद से भारतीयों
का परिचय तो था, लेकिन प्रयोग बाबर के आक्रमण के साथ ही आरम्भ हुआ।बाबर की
सुदृढ़ रक्षा-पंक्ति का इब्राहिम लोदी को कोई आभास नहीं था। उसने सोचा कि
अन्य मध्य एशियायी लड़ाकों की तरह बाबर भी दौड़-भाग कर युद्ध लड़ेगा और
आवश्यकतानुसार तेज़ी से आगे बढ़ेगा या पीछे हटेगा। सात या आठ दिन तक
छुट-पुट झड़पों के बाद इब्राहिम लोदी की सेना अन्तिम युद्ध के लिए मैदान
में आ गई। बाबर की शक्ति देखकर लोदी के सैनिक हिचके इब्राहिम लोदी अभी अपनी
सेना को फिर से संगठित कर ही रहा था कि बाबर की सेना के आगे वाले दोनों
अंगों ने चक्कर लगा कर उसकी सेना पर पीछे और आगे से आक्रमण कर दिया। सामने
की ओर बाबर के तोपचियों ने अच्छी निशानेबाज़ी की लेकिन बाबर अपनी विजय का
अधिकांश श्रेय अपने तीर अन्दाज़ों को देता है।
बाबर ने लिखा है कि क़ाबुल जीतने (1504) से लेकर पानीपत की लड़ाई तक उसने हिन्दुस्तान जीतने का विचार कभी नहीं त्यागा। लेकिन उसे भारत विजय के लिए कभी सही अवसर नहीं मिला था। "कभी अपने बेगों के भय के कारण, कभी मेरे और भाइयों के बीच मतभेद के कारण।" मध्य एशिया के कई अन्य आक्रमणकारियों की भांति बाबर भी भारत की अपार धन-राशि के कारण इसकी ओर आकर्षित हुआ था। भारत सोने की क़ान था। बाबर का पूर्वज तैमूर यहाँ से अपार धन-दौलत और बड़ी संख्या में कुशल शिल्पी ही नहीं ले गया था, जिन्होंने बाद में उसके एशिया साम्राज्य को सुदृढ़ करने और उसकी राजधानी को सुन्दर बनाने में योगदान दिया, बल्कि पंजाब के एक भाग को अपने कब्जे में कर लिया था। ये भाग अनेक पीढ़ियों तक तैमूर के वंशजों के अधीन रहे थे। जब बाबर ने अफ़ग़ानिस्तान पर विजय प्राप्त की तो उसे लगा कि इन दोनों पर भी उसका क़ानूनी अधिकार है।
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